Tuesday, March 29, 2011

आरती - एक वैश्विक वन्दना


आरती

हमारे हिन्दु समाज में एक आरती सभी धार्मिक कार्यों के अन्त मे गायी जाती है. हम सभी हिन्दु भाईओ को इस आरती का ज्ञान है क्योकि  सभी हिन्दु परिवारों मे वार-त्योंहार पर इस आरती का गायन किया जाता है. बड़ा ही अद्धभुत है इस आरती का दर्शन . परमात्मा के बारें सब कुछ ही इस आरती में आ जाता है. बहुत बड़े अनुष्ठान में अगर आप भाग लेने से चूक गये है तो अनुष्ठान के अन्त में बोले जाने वाली आरती में भाग लेकर उस बड़े अनुष्ठान को समझा जा सकता है. 

यह आरती है ॐ जय जगदीश हरे !

अब इस पर विस्तार से चर्चा करते है

ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के सकंट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

वो एक ही जगदीश है, पालन हार है जो सभी के कष्ट व संकट एक ही क्षण में दूर कर देता है ! उसी ॐ रुपी ईश्वर की जय हो .

जो ध्यावें फल पावे, दुख बिनसे मन का ।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

जो इस ॐ रूपी ईश्वर क ध्यान करता है उसके मन के सभी दुख दूर हो जाते है ( यह मन ही सभी दुखो का कारण है ) सुख रुपी सम्पति उसके मन रुपी घर में आ जाती है और उसके तन के भी सभी दुख मिट जाते है .

मात पिता तुम मेरे,  शरण गहुं मै किसकी ।
तुम बिन और ना दूजा,  आस करु मै जिसकी ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

हे ॐ रुपी ईश्वर एक तुम ही तो मेरे माता और पिता हो तुम्हारे सिवा मेरा और कोई नही हो सकता जिसकी मै शरण में जाऊ और जिससे मै किसी भी प्रकार की आशा रखु .

तुम पुरण परमात्मा, तुम अंतरयामी ।
पार ब्राह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

तुम ही एक परमात्मा हो जोकि सबके मन की बात को जान लेता है । हे महान ईश्वर आप सबके स्वामी है सब कुछ आपके भीतर ही घटित हो रहा है ॥

तुम करूणा के सागर, तुम पालन कर्ता ।
मै मुर्ख खल-कामी, मै सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

हे ॐ रुपी ईश्वर तुम करुणा के सागर हो सभी जीवों की पालना भी तुम्ही करते हो, मै तो एक मुर्ख जीव ही हुं जो इस बात को नही समझ पाया . हे मेरे स्वामी तुम ही मुझ पर करुणा बरसा कर मुझ पर कृपा करो ताकि मै यह बात समझ सकू और तुम्हे पा सकू |

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मै कुमति ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

हे ईश्वर मै जानता हू कि मै आपको अपनी इन आंखो से नही देख पाता . अर्जुन को तो आपने दिव्य चक्षु दे दिये थे जिससे वो आप को समझ पाया था प्रन्नतु मै यह जरुर जानता हू कि तुम हम सबके प्राण के रुप मे हमारे अन्दर ही विधमान हो . लेकिन आपको किस तरीकें से मिलू यह भी मुझे नही पता . इसलिये हे दया के सागर ! हे हम सबके पालनहारें ! आप ही वो विधि बताओ जिससे मै आपको पा सकू.

दीनबंधु दुख हर्ता, ठाकुर तुम मेरे ।
अपने हाथ दया करो शरण लगाओ, द्वार पड़ा मै तेरे ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

हे ईश्वर आप तो दीन-दुखियों के दुखो को हरने वाले है.  मै आपके पास आया हु प्रभु मुझे अपनी शरण में ले लिजिये .

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा ।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, ह्र्दय प्रेम जगाओ, सतंन की सेवा ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

हे ईश्वर मेरे मन के सभी विषय और विकारो को मिटा दो ताकि मेरे पाप अपने आप ही मिट जाये मेरे मन में भक्ति और प्रेम का संचार हो और मै सभी संत जनो की सेवा में लग जाऊ .

क्या आपको इस आरती के मर्म को समझने पर कही लगता है कि यह किसी धर्म विशेष के लिये है . वास्तव में ही यह एक वैश्विक वन्दना है उस एक मात्र परमात्मा की जो सभी जगह एक है सर्वव्यापी है, अचल है स्थिर है
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Note: om Jai Jagdish Hare ...Written by pt. Shradha Ram Phillauri ji in 1870

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