Thursday, March 24, 2011

गीता जी पर मेरे अनुभव

गीता जी पर मेरे अनुभव 

मैंने कोई ५ साल पहले इस ग्रन्थ का अध्यन करना शुरू किया था | हुआ यह था की मैं एक विश्व विख्यात पुस्तक " Autobiography of a Yogi" में एक बात पढ़ी थी की श्री लाहिरी महाशय गीता जी के एक श्लोक पर ही कई कई दिन चर्चा करते थे तब गीता जी को जानने की इच्छा हुई की ऐसा क्या है इस पुस्तक में . 

मैंने धीरे धीरे इस ग्रन्थ का अध्यन करना शुरू किया शुरू में समझने में बहुत ही कठनाई आई | फिर अच्छे अच्छे टीकाकारों की रचनाओ का अध्यन करना शुरू किया . कुछ कुछ समझ आने लगा और इस प्रकार से गीता जी के साथ यात्रा चलती रही और अब भी चल रही है. 

ज्यादा कुछ शायद समझ न भी आया हो परन्तु ईश्वर के सच्चे स्वरुप की समझ आई , प्रकृति और ईश्वर में अन्तर समझ आया ! और भी काफी ऐसी बाते समझ में आई जिनका पहले से बिकुल ज्ञान नहीं था . 

सबसे बड़ी बात यह हुई की मेरी समझ अपने आप ही काफी सूक्ष्म हो गयी . जिससे अन्य ग्रंथो का और अन्य धर्मो का व विभिन्न सम्प्रद्यो का  सूक्ष्मता से अवलोकन करना भी अपने  आप आ गया !

जीवन के प्रति एक नया दृष्टिकोण  आया !  पहले दुनिया को कुछ कर दिखाने की जो आसक्त भावना थी वो आसक्त रहित होने लगी . ऐसा धीरे धीरे होने लगा . सबसे बड़ी बात यह हुई की बुद्दि सूक्ष्म होने लगी . प्रकृति की कार्य प्रणाली नज़र आने लगी . 

मेरी नज़र में जो कोई भी साधक अध्यात्मिक मार्ग में यदि उन्नति करना चाहता हो उसे कम से कम २०० बार गीता जी को पढना चाहिए और जिनती भी हो सके गीता जी पर लिखी हुई टीकाए अवश्य पढनी चाहिए और उसके बाद लगातार गीता जी का अध्यन करते रहना चाहिए . 

मेरा अध्यन चल रहा है और चलता रहेगा . गाँधी जी ने गीता जी को माँ का दर्ज़ा दिया है उन्होंने गीता जी पर जो टीका लिखी है उस पुस्तक का नाम भी 'गीता माता' है. गीता जी वास्तव में ही हमारी अध्यात्मिक माता है जो हमें हमारे अध्यात्मिक लक्ष्य का मार्गदर्शन करती है . 




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