Thursday, March 31, 2011

परमात्मा


परमात्मा !

देखिये परमात्मा कि अगर बात करे तो बहुत ही सूक्ष्म बुद्दि कि आवश्कता है . क्योकि अब बहुत सारी गड़बड़ हो चुकी है महान ऋषियों के समझाने में और हमारे समझने में . बात परमात्मा के स्वरुप की है जिसे समझना बहुत ही जरुरी है तभी बात बन सकेगी, नहीं तो प्रकृति के चक्कर में ही फंसे रह जायेगे. अगर मूर्ति पूजा कि बात करे तो वहा अनेकता है . क्योंकि समझाने वाला समझाना कुछ चाहता था और हम अपनी बुद्दि के अनुसार समझ कुछ गए . 
अभी कुछ समय पहले ही मैं ज्ञानी संत सिंह मसकीन जी को सुन रहा था; वो कह रहे थे कि जिनते भी साज़ हुए है बांसुरी है , तबला है, मंदिर में बजने वाली घंटिया है  और बहुत सारे साज़ है यह सब महान ऋषियों द्वारा अतिन्द्रिये अवस्था में अन्दर सुनी हुई आवाजे है जिन्हें उन्होंने बहार कि दुनिया को समझाने का प्रयास किया. आज हम बांसुरी सुन कर झूमते तो है पर यह झूमना लौकिक है जब कि इसे बताने वाले का मतलब कुछ और था ; जिन लोगो ने अनहद नाद पर अभ्यास किया है वो इस बात को आसानी से समझ सकते है . यानि बताने वाला बताना कुछ चाहता है और समझने वाला अपने ढग से कुछ और समझ लेता  है . 

इसीलिए ही हर एक क्षेत्र में भगवान् कि मुर्तिया भी वहा रह रहे लोगो के चेहरों के अनुरूप ही होती है . उतर भारत में भगवान् नैन नक्श उतर भारतीयों जैसे होगे , दक्षिण भारत में दक्षिण भारतीयों जैसे , जापान में जापानियों जैसे और ब्रिटेन में ब्रितानियो जैसे , वहा कि मूर्ति यहाँ नहीं चल सकती और यहाँ कि मूर्ति वहा नहीं चल सकती . समस्या यह नहीं है , समस्या तो उस सर्वशक्ति मान के यथार्थ स्वरुप को समझने कि है . ऐसा भी नही है कि अन्य धर्मो में संतो ने इसके बारे में कुछ कहा नहीं है , कहा है बाबा नानक ने , कहा है संत बुल्ह्हे शाह ने , कहा है सूफी संत मेवलाना जेलालुद्दीन रूमी ने, कहा है प्रभु यीशु ने, कहा है कबीर ने, कितने संतो का नाम गिनाऊ; लिखते लिखेते  मैं थक जाउगा और पढ़ते पढ़ते आप थक जायेगे . सभी महान धर्मो के महान संतो ने  परमात्मा का  असली स्वरुप बताने की हर संभव कोशिश कि है और बहुतेरो ने समझा भी है . 
हम सबको भी भगवान् के सच्चे स्वरुप को समझ के उस पर ही चिंतन करना है ताकि बरसो से चली आई गड़बड़ का सुधार हो . 
जल्द ही मैं एक बड़े ही सुन्दर लेख "परमात्मा का स्वरुप" के माध्यम से कुछ प्रकाश  डालने कि कोशिश करुगा . ...................

Tuesday, March 29, 2011

कर्म योग पर मेरे विचार ......


कर्म योग पर मेरे विचार ......

बड़ा ही रोचक विषय है कर्म योग और उलझन वाला भी है . कर्मयोग को मै गीता जी के माध्यम से बताने की कौशिश करुगा निम्नलिखित विषयों मे माध्यम से :-

१. आत्मा
२. मनुष्य शरीर
३. कर्म
४. प्रकृति
५. मन
६. पांच विकार (प्रकृति मे विचरण करने वाले विषय)

आत्मा प्रकृति के तीन गुणों द्वारा इस मनुष्य शरीर में स्थापित है और यही तीन गुण ही आत्मा को इस संसार में बाधें रखते है. यह तीन गुण है 
१. सत्तोगुण २. रज़ोगुण ३. त्तमोगुण

कर्म क्यां है - हमारे द्वारा की जाने वाली कोई भी क्रिया वो चाहे शारीरिक हो या मानसिक,  कर्म कहलाती है. वैसे कर्म के होने की शुरुआत सबसे पहले मन में ही होती है. मन हमारे मस्तिक के अन्दर एकत्रित हुई सूचनाओं का इतनी तेज़ी से विश्लेषण करता है कि इस कार्य मे उसका कोई भी सानी नही है. मन द्वारा विश्लेषण की गई सूचनाओं से तुरन्त प्रेरित हो कर हम कर्म करने को बाध्य हो जाते है. हमारे सभी अच्छे या बुरे कर्मो को जन्म मन ही देता है. इसलिए ही सारे संसार में योग की जितनी पद्तियां कार्य कर रही है उनका सबसे पहला व अहम कार्य मन को रोकना ही है. 

अब बात यह पैदा होती है कि मस्तिक तक सूचनाएं पहुचती कहां से है. उसका जवाब है हमारी इन्द्रियां. जीव प्रकॄति में उपलब्ध विषयों को इन इन्द्रियों के माध्यम से ग्रहण करता है और मन द्वारा भ्रमित हो कर प्रकृति के तीन गुणों के चंगुल में फ़स जाता है. यह प्रक्रिया इस प्रकार से है - प्रकृति में उपलब्ध विषय हमारी इन्द्रियों को उलझाते है और इन्द्रियां हमारे मन को उलझाती है मन बुद्दि को और बुद्दि आत्मा को उलझा कर इस मनुष्य शरीर में बान्ध कर कर्म करने को बाध्य करती है . 

तब प्रकृति हमसे अपने तीन गुणों के ज़ोर पर कर्म करवाती चली जाती है और फल स्वरूप हमे यह तीन गुण ही मिलते है,  वो फल कोई भी हो सकता है सात्त्विक, राज़सिक या फिर तामसिक  तब हम यह सोच रहे होते है कि मैने यह कर दिखाया, मैने वो कर दिखाया या फिर उलटा होने पर भगवान को भी दोष दे देते है. जब कि वास्तव में हम एक विशेष प्रणाली के तहत ही कार्य कर, फल प्राप्त कर रहे होते है. मज़े की बात यह है कि प्रकृति ही हमसे कर्म करवाने का काम करती है और प्रकृति ही फल देने का कार्य करती है. प्रकृति के पास वार करने के लिए तीन गुण ही है . आमतौर पर हम कुछ कौशिश करके दो गुण, रज़ोगुण और तमोगुण से तो कुछ हद तक बच जाते है परन्तु तीसरे गुण यानि सत्तोगुण से नही बच पाते. तब हम यह सोच रहे होते है कि हम तो धार्मिक कार्य कर रहे है, सात्त्विक कार्य कर रहे है और फिर फल चाहने लगते है. पत्ता नही हमे क्यूं लगता है कि सात्त्विक कार्यों का फल कुछ ज्यादा ही मीठा होगा जबकि यह भी प्रकृति का एक वार ही है . गीता हमे तीनों गुणो से ऊपर उठने का सन्देश देती है. देखिये एक भी गुण का थोड़ा सा अंश भी मुक्त होने में बाधक बन सकता है. क्योकि आत्मा को इस मानव शरीर मे प्रकृति के यह तीन गुण ही बाधंते है और बिना तीन गुणों को छोड़े आत्मा मुक्त हो ही नही सकती.

यही कर्म योग है. कर्म के द्वारा योग यानि कर्म भी करना और फल की ईच्छा न रखना ही कर्मयोग है. समस्या मन से ही है और खतरा भी मन से ही है. क्योकि हमारे (जीव) और प्रकृति के बीच कार्य प्रणाली चलाने वाली जो प्रक्रिया है वो मन है. ऐसा नही है कि मन कोई बुरी चीज है और न ही मन से डरना चाहिये याद रखिये गीता में कहा गया है कि आत्मा जोकि इन्द्रियां, मन,  बुद्दि से परे है, सूक्ष्म है और बहुत ही शक्तिशाली है. हम आत्मा की शक्ति से कौशिश करके मन पर विजय पा सकते है. 

जरूरत है इस विशेष प्रणाली को समझने की और समझ कर इस प्रणाली के तहत कार्य करने की . जब यह समझ आ जायेगा तब सभी प्रकार के योग अपने आप ही सिद्द हो जायेगे. जब कर्म का बन्धन नही होगा तो प्रकृति आप पर अपना जादू नही चला पायेगी और तब आप और ईश्वर के बीच और कोई नही होगा . गीता कहती है कि कर्म योग से बुद्दि अति सूक्ष्म हो जाती है और फिर थोड़े से ध्यान से भी उस अन्नंत आन्नंद का हिस्सा बना जा सकता है. यह सब कुछ वैज्ञानिक है, तकनीकी है और इसे इसी ढंग से ही समझना होगा तभी बात बन पायेगी.  यह है कर्मयोग .........

आरती - एक वैश्विक वन्दना


आरती

हमारे हिन्दु समाज में एक आरती सभी धार्मिक कार्यों के अन्त मे गायी जाती है. हम सभी हिन्दु भाईओ को इस आरती का ज्ञान है क्योकि  सभी हिन्दु परिवारों मे वार-त्योंहार पर इस आरती का गायन किया जाता है. बड़ा ही अद्धभुत है इस आरती का दर्शन . परमात्मा के बारें सब कुछ ही इस आरती में आ जाता है. बहुत बड़े अनुष्ठान में अगर आप भाग लेने से चूक गये है तो अनुष्ठान के अन्त में बोले जाने वाली आरती में भाग लेकर उस बड़े अनुष्ठान को समझा जा सकता है. 

यह आरती है ॐ जय जगदीश हरे !

अब इस पर विस्तार से चर्चा करते है

ॐ जय जगदीश हरे स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के सकंट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

वो एक ही जगदीश है, पालन हार है जो सभी के कष्ट व संकट एक ही क्षण में दूर कर देता है ! उसी ॐ रुपी ईश्वर की जय हो .

जो ध्यावें फल पावे, दुख बिनसे मन का ।
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

जो इस ॐ रूपी ईश्वर क ध्यान करता है उसके मन के सभी दुख दूर हो जाते है ( यह मन ही सभी दुखो का कारण है ) सुख रुपी सम्पति उसके मन रुपी घर में आ जाती है और उसके तन के भी सभी दुख मिट जाते है .

मात पिता तुम मेरे,  शरण गहुं मै किसकी ।
तुम बिन और ना दूजा,  आस करु मै जिसकी ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

हे ॐ रुपी ईश्वर एक तुम ही तो मेरे माता और पिता हो तुम्हारे सिवा मेरा और कोई नही हो सकता जिसकी मै शरण में जाऊ और जिससे मै किसी भी प्रकार की आशा रखु .

तुम पुरण परमात्मा, तुम अंतरयामी ।
पार ब्राह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

तुम ही एक परमात्मा हो जोकि सबके मन की बात को जान लेता है । हे महान ईश्वर आप सबके स्वामी है सब कुछ आपके भीतर ही घटित हो रहा है ॥

तुम करूणा के सागर, तुम पालन कर्ता ।
मै मुर्ख खल-कामी, मै सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

हे ॐ रुपी ईश्वर तुम करुणा के सागर हो सभी जीवों की पालना भी तुम्ही करते हो, मै तो एक मुर्ख जीव ही हुं जो इस बात को नही समझ पाया . हे मेरे स्वामी तुम ही मुझ पर करुणा बरसा कर मुझ पर कृपा करो ताकि मै यह बात समझ सकू और तुम्हे पा सकू |

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मै कुमति ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

हे ईश्वर मै जानता हू कि मै आपको अपनी इन आंखो से नही देख पाता . अर्जुन को तो आपने दिव्य चक्षु दे दिये थे जिससे वो आप को समझ पाया था प्रन्नतु मै यह जरुर जानता हू कि तुम हम सबके प्राण के रुप मे हमारे अन्दर ही विधमान हो . लेकिन आपको किस तरीकें से मिलू यह भी मुझे नही पता . इसलिये हे दया के सागर ! हे हम सबके पालनहारें ! आप ही वो विधि बताओ जिससे मै आपको पा सकू.

दीनबंधु दुख हर्ता, ठाकुर तुम मेरे ।
अपने हाथ दया करो शरण लगाओ, द्वार पड़ा मै तेरे ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

हे ईश्वर आप तो दीन-दुखियों के दुखो को हरने वाले है.  मै आपके पास आया हु प्रभु मुझे अपनी शरण में ले लिजिये .

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा ।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, ह्र्दय प्रेम जगाओ, सतंन की सेवा ॥ ॐ जय जगदीश हरे !

हे ईश्वर मेरे मन के सभी विषय और विकारो को मिटा दो ताकि मेरे पाप अपने आप ही मिट जाये मेरे मन में भक्ति और प्रेम का संचार हो और मै सभी संत जनो की सेवा में लग जाऊ .

क्या आपको इस आरती के मर्म को समझने पर कही लगता है कि यह किसी धर्म विशेष के लिये है . वास्तव में ही यह एक वैश्विक वन्दना है उस एक मात्र परमात्मा की जो सभी जगह एक है सर्वव्यापी है, अचल है स्थिर है
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Note: om Jai Jagdish Hare ...Written by pt. Shradha Ram Phillauri ji in 1870

Monday, March 28, 2011

आत्मा क्यां है ?


आत्मा क्यां है ?

बहुत से भाई इस बात को ही नही मानते की आत्मा नाम की कोई वस्तु या शक्ति भी है . देखिये इसे बहुत ही सधारण उदाहरण से समझा जा सकता है . देखिये शरीर तो है ही जो हर किसी को दिख रहा है . लेकिन यह बात भी सच है कि जब कोई व्यक्ति मर जाता है तब भी शरीर तो रहता ही है, परन्तु मृत होता है . जो भी शक्ति शरीर को जीवित बनाती है और उसे कार्य करने के लायक बनाती है, उस शक्ति को ही आत्मा कहते है . 

गीता जी में आत्मा का जो विवरण दिया गया है वो इस प्रकार से है :- 

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारूत: ॥ (अध्याय २ श्लोक सख्यां २३)

इस आत्मा को शस्त्र नही काट सकते, इसको आग नही जला सकती, इसको जल नही गला सकता और वायु नही सुखा सकता ॥

यानि एक ऎसी शक्ति या वस्तु जिसे काटा न जा सके यानि किसी भी प्रकार का शस्त्र हो या किसी भी प्रकार की तकनीक हो चाहे आज की लेज़र तकनीक भी क्यों ना हो तो भी आत्मा को नही काटा जा सकता. इसको आग नही जला सकती यानि कितना भी तापमान क्यों न हो चाहे तो परमाणु विस्फ़ोट जितना भी तापमान हो तो भी इस आत्मा को नही जलाया जा सकता . इसी प्रकार इसे जल नही गला सकता और वायु भी नही सुखा सकता .

अब आगे चलते है :- 

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ (अध्याय २ श्लोक सख्यां २५)

यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकार रहित कहां जाता है ।

यानि यह आत्मा एक अलग प्रकार की शक्ति या वस्तु है जो इस संसार की अन्य सभी वस्तुओं से न्यारी है . बिल्कुल अलग . इतनी अलग कि इसको हम व्यक्त भी नही कर सकते इतनी अलग कि हम इसका चितंन भी नही कर सकते . यानि इस आत्मा के गुण हमारे यहा की किसी भी वस्तु या शक्ति से मेल नही खाते. यह इस प्रकृति के अन्दर की वस्तु नही है और न ही हमारे मन व दिमाग की सीमा के अन्दर आती है . गीता जी में इसीलिये ही स्वयं ने परमात्मा आत्मा को अपना ही अंश बताया है . और इस आत्मा को जान कर ही उस असीम शक्ति परमात्मा में मिलाने को कहा है . 




उतरायण और दक्षिणायन


इस जगत में आत्मा के आवागमन के लिये गीता जी में दो मार्ग बताये गये है . उतरायण और दक्षिणायन 

उतरायण मार्ग :-  

इसे देवयान भी कहते है . इस मार्ग से यात्रा करने वाले जीवों को इस संसार मे वापिस नही आना पड़्ता . इसे मार्ग ज्योतिर्मय मार्ग कहा जाता है . जब सुर्य उतर की ओर यात्रा कर रहा होता है तो उतरायण चल रहा होता है . उतरायण छ: महीनो का होता है . इस बात की पुष्टि महाभारत की एक घटना से होती है जो कि इस प्रकार से है - जब भीष्म पितामह अर्जुन द्वारा छोड़े गये बाणों से बीन्ध गये थे तभी उन्होने देखा की सुर्य दक्षिणायन में है और उतरायण आने में अभी काफ़ी समय बाकि है . तभी उन्होने एक तकिये की मांग की जिसे अर्जुन ने दो बाणों का तकियां बना कर पुरी की. उसके बाद उन्होने श्री कृष्ण के कहने से पाण्डवों को ज्ञान भी दिया और तब उतरायण आने पर ही अपने प्राणो का त्याग किया.

दक्षिणायन मार्ग :-

इसे पितृयान भी कहते है . इस मार्ग से मरकर गये जीव को अपने कर्मों के अनुसार फल भोग कर इस पृथ्विलोक में वापिस आना पड़्ता है . इसे मार्ग कृष्ण मार्ग कहा जाता है . जब सुर्य दक्षिण की ओर यात्रा कर रहा होता है तो द्क्षिणायन चल रहा होता है . द्क्षिणायन भी छ: महीनो का ही होता है .

इन दोनों मार्गो के बारे में गीता के १८ वें अध्याय श्लोक सख्यां २३, २४, २५, २६ में उल्लेख मिलता है. 

Sunday, March 27, 2011

त्राटक और अन्तर्त्राटक


त्राटक और अन्तर्त्राटक

त्राटक का अर्थ होता है किसी वस्तु-विशेष लगातार खुली आँखो से टकटकी लगाकर देखते रहना । त्राटक के अभ्यास से एकाग्रता बड़ती है । इससे मन की बिखरी हुई शक्तियों को एकाग्र कर के मानसिक व आध्यात्मिक शक्तियों को बड़ाया जा सकता है  ।

त्राटक की दों अवस्थायें होती है:-

१. त्राटक या बाह्य त्राटक
२. अन्तर्त्राटक

त्राटक या बाह्य त्राटक

इसमें मन को बाह्य वस्तु-विशेष पर एकाग्र किया जाता है. क्योकि हम बाह्य जगत से अधिक जुड़े होते है तो यह अभ्यास बहुत ही आसान रहता है । मन को एकाग्र करने के लिये किसी एसी वस्तु का चुनाव किया जाता है जो मन अच्छी लगे इसके लिये ॐ, कोई धार्मिक चिन्ह, गुरू या इष्ट देव का चित्र, कोई बिन्दु या फिर मोमबत्ती की लौ में से कुछ भी चुना जा सकता है. इसमें आईने का भी ईस्त्माल भी किया जा सकता है ।

अन्तर्त्राटक

इसका अभ्यास मन को अर्न्तमुख बनाने के लिये किया जाता है । पहले बाह्य त्राटक का अभ्यास किया जाता है तब बाह्य त्राटक का अभ्यास करते समय आँखे बन्द करने पर जो बिम्ब दिखायी पड़ता है उसका इस्तमाल अन्तर्त्राटक में किया जाता है ।

त्राटक का अभ्यास अधिकतम स्थिर आसन में किया जाता है इसका अभ्यास सिद्धासन, सिद्धयोनि आसन में करना श्रेयस्कर होता है । इसे सुखासन या बैठ कर भी किया जा सकता है. त्राटक के अभ्यास के लिये कुछ महत्वपूर्ण बातें इस प्रकार से है:-

१. इसका अभ्यास करते वक्त आँखो को झपकाना नही चाहिये । दृष्टि भी स्थिर होनी चाहिये ।
२. मन को केवल वस्तु या उसके बिम्ब पर ही टिकाये रखना होता है ।
३. इसमें वस्तु को २ फ़ीट की दूरी पर रखा जाता है ।
४. अभ्यास के दौरान जब ध्यान स्थिर हो जाता है तब साक्षी भाव से देखना होता है ।

त्राटक के अभ्यास से अनेक लाभदायक प्रभाव देखने को आते है । इससे स्मरण शक्ति बड़ती है । आँखो की मांसपेशिया मजबूत होती है । इससे आतंरिक ऊर्जा का भण्डार खुल जाता है । भारत में रहस्यमय गुप्त शक्तियां प्राप्त करने के लिये त्राटक का अभ्यास किया जाता है । ईसाइयों में भी प्रतिमाओ, पवित्र चित्रों और धार्मिक चिन्हों पर त्राटक किया जाता है । त्राटक से एकाग्रता बड़ती है क्योंकि इसमें चेतन ऊर्जा को एक बिन्दु की और उन्नमुख किया जाता है तो यह अभ्यास स्वतः ध्यान की और ले जाता है ।

ध्यान क्या है ?

ध्यान क्या है ?
छोटी सी बात लेकर शुरुआत करते है . जो हम सब के साथ रोजाना घटित होती है . मैं यह समझाना चाह रहा हूँ कि ध्यान के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते . हमारी सभी इन्द्रियां कान, नाक , मुहँ, आंखे इत्यादि बिना ध्यान के कार्य नहीं कर सकती जैसे कि मान लीजिये कि आप एक सुंदर बगीचे में खड़े है और आपकी आंखे बड़ा ही सुंदर दृश्य निहार रही है और तभी आपका ध्यान आपके घर पर चला जाता है अब आपको बगीचे के सुंदर दृश्य कि बजाये आपका घर दिखाई देने लग जाता है जब कि आप अभी भी उस बगीचे में ही है और आपकी आंखे के सामने अभी भी वही सुंदर दृश्य ही है परन्तु ध्यान नहीं है . इसी प्रकार अन्य इन्द्रिया भी ध्यान के साथ ही काम करती है ध्यान के बिना कोई भी इन्द्री अपना कार्य नहीं कर सकती . ध्यान हमारे जीवन की एक बहुमूल्य शक्ति है जिसके बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते . स्वामी राम कृष्ण मठ के रित्जानंद कहते है कि "ध्यान हमारे पास एक अति बहुमूल्य शक्ति है जिसे व्यर्थ नहीं गवाना चाहिए हमें चाहिए कि जिसकी सहायता से हम इस संसार में जीते है उस ध्यान को एकाग्रता की शक्ति से अपने विचारो पर प्रभुत्व स्थापित कर अपने वास्तविक स्वरुप विशुद्ध चैतन्य को उपलब्ध हो सके "